SellingInUS

6 सेकंड में कमाल करें: बम्पर एड का असली खेल

YouTube पर हर दिन लाखों वीडियो देखे जाते हैं। आपका ब्रांड उनमें से सिर्फ एक है। और आपके पास सिर्फ 6 सेकंड हैं। बम्पर एड्स को अक्सर 'उस छोटे से विज्ञापन' की तरह देखा जाता है जो कोई बड़ा असर नहीं डालता। लेकिन अमेरिका में काम करते हुए मैंने देखा है कि ये 6 सेकंड किसी पूरे अभियान की दिशा ही बदल सकते हैं-अगर आप सही तरीका जानते हों।

सवाल यह नहीं है कि बम्पर एड काम करते हैं या नहीं। सवाल यह है कि आप उन्हें कैसे इस्तेमाल करते हैं। ज़्यादातर लोग इन्हें सिर्फ 'दिखाने' के लिए रखते हैं-लोगो दिखाओ, नाम बोलो, खत्म। लेकिन असली फ़ायदा तब मिलता है जब आप इन 6 सेकंड्स को एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते हैं, न कि सिर्फ एक ढाल की तरह।

रीटार्गेटिंग का नया इंजन

मैंने एक बार एक ई-कॉमर्स कंपनी के साथ काम किया। वे एक स्मार्ट होम डिवाइस बेचते थे-ऐसा प्रॉडक्ट जिसे समझाने के लिए कम से कम 30 सेकंड का वीडियो चाहिए। उनका बजट सीमित था। उन्होंने कहा, "हम बम्पर एड क्यों लगाएँ? इतने कम समय में कोई प्रॉडक्ट नहीं समझेगा।" मैंने उनसे कहा, "ठीक है, चलो एक प्रयोग करते हैं।"

हमने तीन अलग-अलग बम्पर एड बनाए। पहले में सिर्फ एक सवाल था-"क्या आपका घर आपसे बात कर सकता है?"-2 सेकंड। दूसरे में दिखाया कि हमारा डिवाइस बिना वाई-फाई के कैसे काम करता है-अगले 2 सेकंड। तीसरे में कहा, "अभी 20% ऑफ़र खत्म होने वाला है, लिंक पर क्लिक करें"-आखिरी 2 सेकंड।

यहाँ असली चालाकी यह थी: हमने इन तीनों एड्स को एक सीक्वेंस में रखा। जिसने पहला एड पूरा देखा, उसे 24 घंटे बाद दूसरा एड दिखाया गया। जिसने दूसरा देखा, उसे तीसरा। परिणाम? रीटार्गेटिंग लिस्ट में 40% ज़्यादा एंगेजमेंट और कन्वर्ज़न रेट में ढाई गुना उछाल।

यह कोई जादू नहीं है। यह सिर्फ इस बात को समझना है कि लोगों को एक ही बार में सबकुछ मत दिखाओ। उन्हें एक कहानी का हिस्सा बनाओ। और बम्पर एड उस कहानी का पहला अध्याय बन सकता है।

हर आधे सेकंड की योजना

6 सेकंड में हर फ्रेम मायने रखता है। लेकिन मैं आपको एक कड़वा सच बताता हूँ: ज़्यादातर लोग पहले फ्रेम पर ही हार जाते हैं। YouTube पर जब बम्पर एड लोड होता है, तो पहले थंबनेल दिखता है, फिर वीडियो का पहला फ्रेम। अगर ये दोनों अलग-अलग दिखते हैं, तो दर्शक का दिमाग कहता है-"यह कुछ और है"-और वह स्किप कर देता है।

हमने एक फैशन क्लाइंट के लिए यह टेस्ट किया। वेरिएंट A में थंबनेल में मॉडल का क्लोज़-अप था, लेकिन पहले फ्रेम में प्रॉडक्ट का वाइड शॉट। वेरिएंट B में थंबनेल और पहला फ्रेम बिल्कुल एक जैसे थे-बस थोड़ी सी हलचल थी। नतीजा? वेरिएंट B का क्लिक-थ्रू रेट 3 गुना ज़्यादा था।

इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ: हर 0.5 सेकंड के लिए एक अलग मैसेज प्लान करो। पहले 2 सेकंड में दर्शक को वही दिखो जो उसने थंबनेल में देखा। फिर अगले 2 सेकंड में एक छोटी सी जानकारी दो। आखिरी 2 सेकंड में कार्रवाई के लिए कहो। इसे लिखकर देखो, फ्रेम-बाय-फ्रेम। यह थोड़ा मेहनत का काम है, लेकिन यही फर्क पैदा करता है।

साउंड ऑफ़ का जाल

अमेरिका में मोबाइल पर 85% से ज़्यादा YouTube व्यूज़ साउंड ऑफ़ होते हैं। और बम्पर एड तो फिर भी 6 सेकंड के हैं। अगर आप ऑडियो पर निर्भर रहोगे, तो तुम हार जाओगे। लेकिन क्या करें? सबटाइटल्स? हाँ, लेकिन सादे सबटाइटल्स काम नहीं करते क्योंकि उन्हें पढ़ने में समय लगता है और दर्शक का ध्यान भटकता है।

मैंने एक तरीका खोजा है जिसे मैं मोशन ग्राफिक्स सबटाइटल्स कहता हूँ। इसमें हर शब्द वीडियो के विज़ुअल के साथ सिंक में आता है। जैसे, अगर वीडियो में कोई प्रॉडक्ट घूम रहा है, तो टेक्स्ट भी उसी दिशा में स्लाइड करे। इससे आँखें स्वाभाविक रूप से टेक्स्ट को फॉलो करती हैं, उन्हें पढ़ने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता।

हमने एक बार दो बम्पर एड्स की तुलना की। पहले में सादे कैप्शन थे, दूसरे में मोशन ग्राफिक्स सबटाइटल्स। पहले की रिटेंशन 45% थी, दूसरे की 78%। यह सिर्फ इसलिए था क्योंकि मोशन ग्राफिक्स ने दर्शक को वीडियो के साथ बाँधे रखा। इसलिए अगली बार जब आप बम्पर एड बनाएँ, तो ऑडियो बंद करके देखें। क्या आपकी कहानी बिना आवाज़ के भी समझ में आ रही है? अगर नहीं, तो उसे दोबारा बनाइए।

माइक्रो-इंटरैक्शन: बटन को जिंदा करें

बम्पर एड्स में क्लिक करने का ऑप्शन होता है। लेकिन ज़्यादातर लोग उस पर एक 'विज़िट वेबसाइट' का लिंक डाल देते हैं-बोरिंग। मेरा मानना है कि बटन को भी एक किरदार की तरह होना चाहिए। मैं इसे माइक्रो-इंटरैक्शन कहता हूँ।

एक बार हमने एक ट्रैवल क्लाइंट के लिए एक प्रयोग किया। पहले वर्शन में बटन पूरे 6 सेकंड दिखता रहा-नीचे कोने में एक छोटा सा लिंक। दूसरे वर्शन में बटन सिर्फ आखिरी 1 सेकंड में दिखा, और वह भी एक छोटे से पल्स एनिमेशन के साथ-जैसे वह 'थपथपा' रहा हो। पहले का CTR 0.8% था, दूसरे का 4.2%। यह 5 गुना अंतर था, सिर्फ इसलिए क्योंकि बटन को 'जिंदा' बनाया गया।

यहाँ एक और ट्रिक है: बटन को वीडियो के विज़ुअल के साथ मिक्स करें। अगर वीडियो में कोई प्रॉडक्ट घूम रहा है, तो बटन को उसके साथ-साथ चलने दें। दर्शक का ध्यान स्वाभाविक रूप से उस पर जाएगा। बस यह ध्यान रखें कि बटन बहुत बड़ा या चमकीला न हो-वह मैसेज से ध्यान न हटाए, बल्कि उसे पूरा करे।

सीक्वेंस कैंपेन: छोटी-छोटी कहानियाँ

मैंने पाया है कि सबसे अच्छे बम्पर एड वो नहीं हैं जो एक ही बार में सब कुछ कह दें। सबसे अच्छे वो हैं जो एक श्रृंखला का हिस्सा हों। मैं इसे सीक्वेंस कैंपेन कहता हूँ।

उदाहरण के लिए, एक फिटनेस ऐप के लिए मैंने यह किया: एड 1-"क्या आप सुबह उठकर एक्सरसाइज नहीं कर पाते?" एड 2 (24 घंटे बाद)-"हमारा ऐप आपको 5 मिनट में तैयार कर देता है।" एड 3 (अगले 24 घंटे बाद)-"अब कोई बहाना नहीं। पहला महीना फ्री।"

हर एड को अलग-अलग ऑडियंस सेगमेंट के लिए सेट किया गया। जिसने एड 1 पूरा देखा, उसे एड 2 दिखाया गया। जिसने एड 2 देखा, उसे एड 3। इस सीक्वेंस ने रीटार्गेटिंग कन्वर्ज़न रेट को 300% बढ़ा दिया। क्यों? क्योंकि दर्शक एक कहानी का हिस्सा बन गए। वे इंतज़ार कर रहे थे कि अगला एपिसोड क्या होगा।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात: हर एड खुद में पूरा होना चाहिए। कोई अगर पहला एड ही देखे और आगे न देखे, तो भी उसे कुछ वैल्यू मिले। और हाँ, हर एड के बीच कम से कम 24 घंटे का गैप रखें-ताकि दर्शक ऊब न जाएँ।

डेटा से करें फैसला, अंदाज़े से नहीं

बम्पर एड को ऑप्टिमाइज़ करने का सबसे अच्छा तरीका डेटा है। मैं हर क्लाइंट के लिए एक स्कोरकार्ड बनाता हूँ जिसमें ये तीन मेट्रिक्स होते हैं:

  • पहले फ्रेम की रिटेंशन-कितने लोग पहला फ्रेम देखने के बाद ही छोड़ देते हैं? लक्ष्य: 95% से ऊपर।
  • मिड-पॉइंट ड्रॉप-ऑफ़-3 सेकंड पर कितने लोग गायब हो जाते हैं? लक्ष्य: 20% से कम।
  • एंड-कार्ड क्लिक्स-आखिरी 1 सेकंड में कितने लोग क्लिक करते हैं? लक्ष्य: 3% से ऊपर।

एक बार हमने एक ब्यूटी क्लाइंट के लिए एक क्रिएटिव को 11 बार ट्वीक किया। हर बार सिर्फ एक फ्रेम बदला। पहले वर्शन में पहले फ्रेम की रिटेंशन 78% थी। आखिरी वर्शन में वह 94% तक पहुँच गई। इसका मतलब है कि 16% ज़्यादा लोगों ने पहला फ्रेम देखा-बिना एक भी रुपया ज़्यादा खर्च किए।

यह सब YouTube Analytics में देखा जा सकता है। वहाँ 'रिटेंशन रिपोर्ट' में देखें कि कहाँ सबसे ज़्यादा ड्रॉप-ऑफ़ होता है। उसी जगह पर एक नया एलिमेंट जोड़ें-एक आश्चर्यजनक इमेज, एक बोल्ड टेक्स्ट, या रंग का बदलाव। हर बार एक छोटा सा बदलाव करें और देखें कि क्या सुधार होता है।

निष्कर्ष: छोटा मतलब कमज़ोर नहीं

YouTube बम्पर एड्स को अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। लेकिन अमेरिका में हमने देखा है कि ये 6 सेकंड पूरे फनल को बदल सकते हैं-अवेयरनेस से लेकर कन्वर्ज़न तक। मुख्य बात यह है कि इन्हें सिर्फ 'दिखाने' के लिए नहीं, बल्कि 'कार्रवाई' के लिए डिज़ाइन करें।

याद रखने वाली बातें:

  • हर फ्रेम की योजना बनाएँ, खासकर पहले दो सेकंड
  • साउंड ऑफ़ के लिए मोशन ग्राफिक्स सबटाइटल्स का इस्तेमाल करें
  • बटन को जिंदा बनाएँ-आखिरी 1 सेकंड में उसे पल्स करने दें
  • सीक्वेंस कैंपेन बनाएँ-एक कहानी को टुकड़ों में बाँटें
  • डेटा के आधार पर हर हफ्ते कम से कम एक बदलाव करें

6 सेकंड छोटे लग सकते हैं, लेकिन अगर सही तरीके से इस्तेमाल किए जाएँ, तो ये आपके मार्केटिंग का सबसे बड़ा हथियार बन सकते हैं। बस इन्हें मत छोड़िए। इन्हें समझिए और इनका पूरा फायदा उठाइए।

ब्लॉग पर वापस जाएँ