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ट्विच ऐड सेटअप की छिपी चाबी: स्ट्रीमर-साइकोग्राफ़िक तरीका

पिछले हफ़्ते मैं एक बड़े अमेरिकी स्नैक ब्रैंड की मार्केटिंग टीम के साथ बैठा था। वो ट्विच पर प्री-रोल वीडियो ऐड चला रहे थे, बजट करीब $50,000, टार्गेटिंग में “गेमिंग इंटरेस्ट” और “18-34 पुरुष” डाला हुआ था। रिजल्ट? हर कोई स्किप बटन दबा रहा था, और चैट में इमोट्स की बजाय बोरियत झलक रही थी। यहीं मैंने उन्हें वो बात बताई जो अमेरिका के बहुत कम मीडिया बायर समझते हैं: ट्विच पर कामयाबी का राज़ डेमोग्राफ़िक डेटा में नहीं, बल्कि स्ट्रीमर की चैट के कल्चर में छिपा है।

ट्विच कोई साधारण वीडियो प्लैटफ़ॉर्म नहीं है। यहाँ 140 मिलियन से ज़्यादा लोग हर महीने सिर्फ़ देखने नहीं आते-वो किसी स्ट्रीमर की डिजिटल जनजाति का हिस्सा बनते हैं, इमोट भाषा में बात करते हैं, और एक ऐसा साझा भावनात्मक ताना-बाना बुनते हैं जिसे कोई स्टैंडर्ड ऐड प्लानर नहीं पकड़ सकता। इस आर्टिकल में मैं आपको स्ट्रीमर-साइकोग्राफ़िक सेटअप का वो गैर-पारंपरिक तरीका सिखाने वाला हूँ, जिससे आपके ऐड लोगों की चैट में घुस जाएँगे, न कि उनके ब्राउज़र के म्यूट टैब में।

आपकी अब तक की सबसे बड़ी ग़लती: ट्विच को “एक और विज्ञापन नेटवर्क” समझना

ट्विच का सेल्फ़-सर्व ऐड मैनेजर खोलिए-वही पुराने ऑप्शन: उम्र, भाषा, जेंडर, गेमिंग इंटरेस्ट। यह सुविधा भ्रमित कर देती है कि बस इन्हें चुनकर कैंपेन लाइव कर दो। लेकिन यहाँ बात समझने की है: आप जब “25-34 साल के पुरुष” को टार्गेट करते हैं, तब आप एक आँकड़े से बात कर रहे हैं। असल ट्विच दर्शक तो xQc की चैट में “PogChamp” स्पैम करने वाला इंसान है, जिसकी रातें डिस्कॉर्ड और ट्विच इमोट लाइब्रेरी में गुज़रती हैं।

दूसरी आम भूल है क्रिएटिव को “गेमिंग स्टाइल” का बनाना-तेज़ बीट, नियॉन कलर, चीखने वाला वॉइसओवर। लेकिन एक हॉरर गेम स्ट्रीमर की चैट का मूड, एक चिल माइनक्राफ्ट स्ट्रीमर की ऑडियंस से एकदम अलग है। जब क्रिएटिव पूरे प्लैटफ़ॉर्म के लिए एक जैसा होता है, तो वो किसी भी कम्युनिटी का हिस्सा नहीं बन पाता। नतीजा? एड ब्लॉकर और म्यूट टैब की बाढ़।

यहीं से शुरू होता है मेरा वो नज़रिया जो मैंने सैकड़ों ट्विच कैंपेन की डिसेक्शन से सीखा है।

नया तरीका: स्ट्रीमर-साइकोग्राफ़िक सेटअप-हर चैट की अपनी एक जान होती है

स्ट्रीमर-साइकोग्राफ़िक सेटअप का सार यह है: हर बड़े और मिड-साइज़ स्ट्रीमर के इर्द-गिर्द एक यूनीक मनोवैज्ञानिक ग्रुप बन जाता है। ये लोग सिर्फ़ गेम नहीं देखते, बल्कि स्ट्रीमर की भाषा, मज़ाक, इमोट्स और यहाँ तक कि टाइमिंग को अपनाकर एक micro-culture बना ल

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