SellingInUS

रीटार्गेटिंग का अगला स्तर: कॉग्निटिव लोड सेगमेंटेशन

शुरुआत करते हैं एक सीधे सवाल से: आखिरी बार आपने किसी रीटार्गेटिंग विज्ञापन पर क्लिक किया था? हो सकता है कि आपको याद भी न हो, क्योंकि ज़्यादातर विज्ञापन हमारी आँखों के सामने से गुज़र जाते हैं। अमेरिका में तो हालत यह है कि हर व्यक्ति रोज़ाना हज़ारों विज्ञापन देखता है, लेकिन उनमें से सिर्फ़ कुछ ही दिमाग़ तक पहुँचते हैं। फिर भी ब्रांड्स उसी पुरानी रीटार्गेटिंग स्ट्रैटेजी पर अड़े हैं - "जिसने प्रोडक्ट पेज देखा, उसे वही प्रोडक्ट दिखाओ।" सच तो यह है कि यह तरीका अब काम नहीं करता। iOS 14 के बाद डेटा सिग्नल कमज़ोर हुए हैं, उपभोक्ता पहले से ज़्यादा सतर्क हैं, और विज्ञापन थकान चरम पर है। इस लेख में मैं आपको एक ऐसी रणनीति बताऊँगा जो शायद ही कहीं कवर हुई हो - कॉग्निटिव लोड और डिसीजन फटीग पर आधारित रीटार्गेटिंग ऑडियंस सेगमेंटेशन। यह कोई ट्रिक नहीं, बल्कि उपभोक्ता के दिमाग़ को समझने का विज्ञान है।

पारंपरिक रीटार्गेटिंग सेगमेंटेशन की सबसे बड़ी कमज़ोरी यह है कि यह सिर्फ़ "किसने क्या देखा" पर चलता है। दो लोग एक ही प्रोडक्ट पेज खोल सकते हैं, लेकिन उनमें से एक शायद सिर्फ़ टाइम पास कर रहा है, जबकि दूसरा गंभीर खरीदार है। दोनों को एक जैसा विज्ञापन दिखाना न सिर्फ़ बजट की बर्बादी है, बल्कि उपभोक्ता को परेशान भी करता है। अब सोचिए, जब कोई व्यक्ति ऑनलाइन शॉपिंग करता है, तो उसके दिमाग़ में क्या चल रहा होता है? वह एक साथ कई टैब खोले बैठा है, कीमतों की तुलना कर रहा है, रिव्यू पढ़ रहा है, और अपने बजट का हिसाब लगा रहा है। यह सब मिलकर उसकी मानसिक ऊर्जा को खत्म कर देता है। मनोविज्ञान में इसे कॉग्निटिव लोड कहते हैं। जब यह लोड बहुत बढ़ जाता है, तो इंसान निर्णय लेने में असमर्थ हो जाता है - यानी डिसीजन फटीग। आपका रीटार्गेटिंग विज्ञापन अगर इस मानसिक स्थिति के हिसाब से ढला नहीं है, तो वह नज़रअंदाज़ हो जाएगा।

पारंपरिक सेगमेंटेशन के तीन बड़े छेद

इससे पहले कि हम नई रणनीति पर आएं, समझते हैं कि पुराना तरीका क्यों फेल हो रहा है।

  • इरादे की गहराई नहीं मापता: एक ही पेज देखने वाले दो लोगों का इरादा बिल्कुल अलग हो सकता है। पारंपरिक सेगमेंटेशन दोनों को एक ही संदेश भेजता है, जिससे उच्च इरादे वाले को ठंडा और कम इरादे वाले को परेशान महसूस होता है।
  • मानसिक
← ब्लॉग पर वापस जाएँ