अमेरिका में डिजिटल मार्केटिंग करने वाला हर कोई यही सुनता है कि प्रोग्रामैटिक का ROI देखने के लिए DSP का डैशबोर्ड खोलो और ROAS देख लो। सच बता दूँ? यह आदत आपके बजट को उसी तरह चुपचाप निगल रही है जैसे दीमक लकड़ी को। जब आप Google Ads या Meta Ads चलाते हैं, तो आप एक बंद कमरे में होते हैं जहाँ प्लेटफ़ॉर्म खुद नियम, डेटा और रिपोर्टिंग तय करता है। लेकिन open-web प्रोग्रामैटिक एक खुला शेयर बाजार है-हर बोली एक मिनी-इन्वेस्टमेंट है, हर इंप्रेशन किसी नीलामी का नतीजा है, और हर डेटा पॉइंट किसी न किसी बिचौलिए के हाथ से गुज़रता है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि प्रोग्रामैटिक ROI को किसी मार्केटिंग रिपोर्ट की तरह नहीं, बल्कि एक फाइनेंशियल सप्लाई-चेन ऑडिट और ऑक्शन-टाइम P&L की तरह ट्रीट करना चाहिए। यह सोच अमेरिका में भी बहुत कम लोगों के पास है।
पिछले कुछ सालों में मैंने दर्जनों ब्रांड्स के प्रोग्रामैटिक अकाउंट ऑडिट किए हैं, और एक पैटर्न हर जगह दिखता है-डैशबोर्ड पर ROAS बढ़िया नज़र आता है, लेकिन बैंक खाते में वैसी ग्रोथ नहीं होती। इसका कारण तीन जगह छिपा होता है, जिन्हें मैं तीन-लीकेज बकेट कहता हूँ। ये तीनों मिलकर आपका असली प्रोग्रामैटिक ROI बनाते हैं या बिगाड़ते हैं। आइए इन्हें एक-एक करके खोलते हैं।
डैशबोर्ड का ROAS आपको धोखा कैसे देता है
अधिकतर टीमें इस फॉर्मूले पर चलती हैं:
ROAS = Platform-reported Revenue / Platform-reported Ad Spend
यह गणित सीधा लगता है, लेकिन इसके पीछे तीन बड़ी चालें हैं। पहली, व्यू-थ्रू कन्वर्ज़न-उपयोगकर्ता ने विज्ञापन देखा, क्लिक नहीं किया, फिर बाद में खुद ब्रांड सर्च करके खरीद लिया। प्लेटफ़ॉर्म उस बिक्री को अपनी जीत गिन लेता है, जबकि हो सकता है कि उस व्यक्ति ने विज्ञापन पर एक सेकंड भी ध्यान न दिया हो। दूसरी, मॉडल्ड कन्वर्ज़न-कुकीज़ खत्म होते ही प्लेटफ़ॉर्म अब “अनुमानित” कन्वर्ज़न दिखाते हैं। ये आँकड़े स्वभाव से ऑप्टिमिस्टिक होते हैं और हकीकत से अक्सर बहुत दूर होते हैं। तीसरी, लास्ट-क्लिक एट्रिब्यूशन-यह बताता है कि आखिरी टचपॉइंट कौन था, यह नहीं कि किस टचपॉइंट ने सच में बिक्री बढ़ाई।
अमेरिका की एक फैशन ई-कॉमर्स कंपनी का उदाहरण लीजिए जिसके साथ मैंने काम किया। उन्होंने रिटार्गेटिंग और इन-मार्केट ऑडियंस पर प्रोग्रामैटिक डिस्प्ले चलाया। डैशबोर्ड 5.4x ROAS दिखा रहा था, और टीम बहुत खुश थी। लेकिन जब हमने एक इंक्रीमेंटैलिटी टेस्ट चलाया-एक ग्रुप को असली विज्ञापन और दूसरे को PSA-तो पता चला कि दोनों ग्रुप के कन्वर्ज़न रेट में कोई सार्थक अंतर ही नहीं था। यानी वे ग्राहक वैसे भी खरीदने वाले थे। असली ROI नेगेटिव था, पर डैशबोर्ड उसे पॉज़िटिव दिखा रहा था।
प्रोग्रामैटिक ROI का क्षय तीन जगह होता है
अब बात करते हैं उन तीन लीकेज की जिनका