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पॉडकास्ट विज्ञापन का ‘पोस्ट-लिसन’ सच

पिछले हफ्ते एक ब्रांड मैनेजर ने मुझसे पूछा- “हमने पॉडकास्ट पर लाखों खर्च कर दिए, प्रोमो कोड भी अच्छे थे, लेकिन सेल क्यों नहीं आई?” मैंने उनसे एक ही सवाल किया, “जब श्रोता ने आपका ऐड सुनकर हेडफोन उतारा, तब आपने उसके लिए क्या तैयार रखा था?” वो चुप हो गए। और ठीक यही वो अंधेरा कोना है, जहाँ अमेरिकी बाज़ार के ज़्यादातर मार्केटर्स हर रोज़ ठोकर खाते हैं।

पॉडकास्ट विज्ञापन को लेकर हर तरफ बस यही बहस है- होस्ट-रीड करें या प्री-प्रोड्यूस्ड ऐड लगाएँ, प्री-रोल बेहतर है या मिड-रोल, CPM कितना होना चाहिए, और कौन सा प्रोमो कोड ज़्यादा चलेगा। लेकिन सच तो ये है कि ये सब बातें पॉडकास्ट के ‘सुनने के दौरान’ तक सीमित हैं। असली जादू तब होता है जब एपिसोड खत्म हो चुका होता है और श्रोता अपने फोन पर गूगल खोलकर ब्रांड का नाम टाइप करता है। मैं इसे ‘पोस्ट-लिसन मोमेंट’ कहता हूँ, और अमेरिका में दस सालों से सैकड़ों कैंपेन हैंडल करने के बाद मैं दावे से कह सकता हूँ कि पॉडकास्ट मार्केटिंग का असली ROI इसी पल में छिपा है।

भरोसा जगाने के बाद का खालीपन

पॉडकास्ट की सबसे बड़ी ताकत है उसका गहरा भरोसा। जब कोई होस्ट रोज़ाना आपके कानों में बोलता है, तो आप उसे दोस्त मानने लगते हैं। और जब वही होस्ट किसी प्रोडक्ट की सिफारिश करता है, तो दिमाग तुरंत एक्शन मोड में आ जाता है। लेकिन यहाँ एक पेंच है- पॉडकास्ट ‘लीन-बैक’ मीडिया है। श्रोता अक्सर गाड़ी चलाते हुए, कुत्ते को घुमाते हुए, या जिम में पसीना बहाते हुए सुन रहा होता है। वह उसी वक्त मोबाइल निकालकर वेबसाइट नहीं खोल सकता। एडिसन रिसर्च और नीलसन के ताज़ा आँकड़े बताते हैं कि 60% से अधिक पॉडकास्ट श्रोता किसी विज्ञापन को सुनने के बाद ब्रांड की तलाश करते हैं, लेकिन यह सर्च घंटों या कभी-कभी एक-दो दिन बाद होती है। अब सोचिए, अगर उस तलाश के दौरान गूगल पर आपका कोई खास इंतज़ाम नहीं मिलता, तो वह चिंगारी बुझ जाएगी।

ज़्यादातर ब्रांड अपनी पूरी रणनीति ‘डायरेक्ट रिस्पॉन्स’ के आसपास बुनते हैं- एक प्रोमो कोड, एक वैनिटी URL, और बस। लेकिन जब श्रोता बाद में सर्च करता है, तो वह सिर्फ “PODCAST20” जैसा कोड भूल चुका होता है या फिर होस्ट का नाम याद रखकर कुछ ऐसा गूगल करता है जिसका आपने अनुमान ही नहीं लगाया। यही वह जगह है जहाँ आप या तो

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